12th Hindi Bihar Board Important Question Answer

बातचीत पाठ Subjective Questions

1. ‘बातचीत’ शीर्षक निबन्ध के निबंधकार हैं

उत्तर- बालकृष्ण भट्ट

2. बालकृष्ण भट्ट किस युग के रचनाकार हैं

उत्तर- भारतेन्दु युग

3. ‘सौ अज्ञान एक सुजान’ उपन्यास के लेखक कौन हैं :

उत्तर- बालकृष्ण भट्ट

4. आर्ट ऑफ कनवरसेशन कहाँ के लोगों में सर्वाधिक प्रचलित है?

उत्तर- यूरोप के

5. बालकृष्ण भट्ट ने किस पत्रिका का संपादन किया था?

उत्तर- प्रदीप

6. बातचीत के माध्यम से बालकृष्ण भट्ट क्या बतलाना चाहते हैं?

उत्तर- बातचीत की शैली।

7. निम्नलिखित में से बालकृष्ण भट्ट का निवास स्थान कौन-सा है?

उत्तर- इलाहाबाद, उत्तरप्रदेश।

8. अगर हम में वाक्शक्ति न होती तो क्या होता ?

उत्तर- अगर हममे वाक्शक्ति न होती तो यह समस्त सृष्टि गूंगी प्रतीत होती । सभी लोग चुपचाप बैठे रहते , हम जो बोलकर सुख और दुःख का अनुभव करते है , वाक्शक्ति न होने के कारण हम वो नही कर पाते ।

9. बातचीत के सम्बन्ध में वेन जॉनसन और एडिशन के क्या विचार है ?

उत्तर – बातचीत के सम्बन्ध में वेन जॉनसन का राय है की बोलने से ही मनुष्य के सही रूप का पता चल पता है । अगर मनुष्य चुप – चाप रहे तो उसके गुण तथा अवगुण का पता नही चल पायेगा । एडिसन का राय है की असल बातचीत सिर्फ दो व्यक्तियों में हो सकती है , जिसका तात्पर्य यह हुआ कि वो एक दुसरे से दिल बोल के बात कर सकते है , अगर वहां कोई तीसरा व्यक्ति आता है तो फिर वो बाते खुल कर नहीं हो पाती है ।

10. ‘ आर्ट ऑफ़ कन्वर्सेशन ‘ क्या है ?

उत्तर- यह बात करने की एक ऐसी कला होती है जिसमे बातचीत के दौरान चतुराई के साथ प्रसंग छोड़े जाते है जिन्हें सुनकर अत्यंत सुख मिलता है । यह कला यूरोप के लोगो में ज्यादा पाई जाती है ।

11. मनुष्य की बातचीत का उत्तम तरीका क्या हो सकता है ? इसके द्वारा वह कैसे अपने लिए सर्वथा नविन संसार की रचना कर सकता है ?

उत्तर – मनुष्य में बातचीत का सबसे उत्तम तरीका उसका आत्म वार्तालाप है । मनुष्य अपने अन्दर ऐसी शक्ति विकसित करे जिसके कारण वह अपने आप से बात कर लिया करे । आत्म वार्तालाप इसलिए जरुरी है ताकि क्रोध पर नियंत्रण पाया जा सके जिससे दुसरो को कष्ट न पहुचे । क्योकि हमारी भीतर की मनोवृति नए रंग दिखाया करती है । वह हमेसा बदलती रहती है । इन्सान को चाहिए कि वो अपने जिह्वा पर काबू रखे तथा अपने मधुर वाणी से दुसरे को प्रसन्न । ऐसा करने से किसी से न तो कटुता रहेगी और ना ही किसी से बैर । इससे दुनिया खुबसूरत हो जाएगी । यही बातचीत का उत्तम तरीका है ।

12. व्याख्या करे             

( a ) हमारी भीतरी मनोवृति नये नये रंग दिखाती है । वह प्रपंचात्मक संसार का एक बड़ा भारी आइना है , जिसमे जैसी चाहो वैसी सूरत देख लेना कोई दुर्घट बात नहीं है ।

उत्तर – प्रस्तुत पंक्ति बालकृष्ण भट्ट द्वारा रचित पाठ बातचीत ‘ से ली गई है । मनुष्य की भीतरी मनोवृति प्रत्येक क्षण नए – नए रंग दिखाती है अर्थात उसमे नए नए विचार आते रहते है । वह इन प्रपंचो से पूर्ण संसार एक बड़ा आईना है जिसमे ऐसी घटना को भी देखा जा सकता है जिसके घटित होने की आशा न हो । अर्थात हमारी भीतरी मनोवृति हमे संसार के समस्त अच्छे – बुरे कार्यों से अवगत कराती है । तक उसका गुण दोष प्रकट नही

( b ) सच है जब तक मनुष्य बोलता नहीं होता ।

उत्तर – प्रस्तुत पंक्तिया विद्वान लेखक बालकृष्ण भट्ट द्वारा रचित पाठ बातचीत से लिया गया है । निबंध के माध्यम से यह बताना चाहते है कि बातचीत ही एक ऐसा विशेष तरीका होता है जिसके कारण मनुष्य आपस में प्रेम से बाते कर उसका आनंद उठाते है परन्तु मनुष्य जब वाचाल हो जाता है अथवा बातचीत के दौरान अपने आप पर काबू नही रख पाता है तो वह दोष है परन्तु जब वही सलीके से बातचीत करता है तो वह गुण है ।मनुष्य के चुप रहने के कारण उसके चरित्र का कुछ पता नहीं चलता परन्तु वह जैसे ही कुछ बोलता है तो उसकी वाणी के माध्यम से उसके गुण और दोष प्रकट होने लगता है ।

उसने कहा था Subjective Questions

  1. ‘ उसने कहा था ‘ कहानी कितने भागो में बटी हुई है कहानी के कितने भागो में युद्ध का वर्णन है ?

उत्तर- उसने कहा था ‘ कहानी को पांच भागो में बांटा गया है । इस पूरी कहानी के तीन भागो में युद्ध का वर्णन है । दुसरे , तीसरे , तथा चौथे भाग में युद्ध का दृश्य है ।

2.कहानी के मुख्य पात्रो की एक सूचि तैयार करे ।

उत्तर- वैसे तो कहानी में कई पात्र है परन्तु जो मुख्य पात्र है उनकी सूचि निम्नलिखित है – लहना सिंह , सूबेदार , सूबेदारनी , बोधा सिंह , अतर सिंह , माहासिंह , वजीरा सिंह , आदि ।

  1. लहना सिंह का परिचय अपने शब्दों में दे ।

उत्तर–
लहनासिंह एक वीर सिपाही है। वह ‘उसने कहा था’ कहानी का प्रमुख पात्र तथा नायक है। लेखक ने कहानी में उसके चरित्र को पूरी तरह उभारा है। कहानी में उसके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ उभरकर सामने आती हैं-

  • कहानी का नायक–कहानी का समस्त घटनाक्रम लहनासिंह के आस–पास घटता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वो कहानी का प्रमुख पात्र तथा नायक है।
  • सच्चा प्रेमी–लहनासिंह एक सच्चा प्रेमी है। बचपन में उसके हृदय में एक अनजान भावना ने जन्म लिया जो प्रेम था। यद्यपि उसे अपना प्रेम न मिल सका लेकिन फिर भी उसने सच्चाई से उसे अपने हृदय में बसाए रखा।
  • बहादुर तथा निडर–लहनासिंह बहादुर तथा निडर व्यक्तित्व का स्वामी है। तभी तो वह बैठे रहने से बेहतर युद्ध को समझाता है।
  • चतुर : लहनासिंह बहादुर होने के साथ–साथ काफी चतुर भी है। इसीलिए उसे लपटन साहब के नकली होने का शक हो गया और उसने चतुराई से उसका भांडा फोड़ दिया।
  • सहानुभूति तथा दयालुपन : लहनासिंह के चरित्र में सहानुभूति तथा दया भाव भी विद्यमान है। इसीलिए वह भीषण सर्दी में भी अपने कम्बल और जर्सी बीमार बोधासिंह को दे
    देता है।
  • वचन पालन : सूबेदारनी ने लहनासिंह से अपने पति और बेटे के प्राणों की रक्षा करने की बात कही थी। लेकिन लहना सिंह ने उसे एक वचन की तरह निभाया और इसके लिए अपने प्राण भी न्योछावर कर दिया।
  1. पाठ से लहना और सूबेदारनी के संवादों को एकत्र करें।

उत्तर– पाठ में लहनासिंह और सूबेदारनी के बीच कुछ संवाद हैं जो निम्नलिखित हैं–

बचपन का संवाद–
“तेरे घर कहाँ है?”
“मगरे में–और तेरे!”
“माँझे में; यहाँ कहाँ रहती है?”
“अतरसिंह की बैठक में, वे मेरे मामा होते हैं।”
“मैं भी मामा के यहाँ हूँ, उनका घर गुरु बाजार में है।”

इतने में दूकानदार………….लड़के ने मुस्कुराकर पूछा–”तेरी कुड़माई हो गई?” इस पर लड़की कुछ आँखें चढ़ाकर ‘धत्’ कहकर दौड़ गई।

…………लड़के ने फिर पूछा–”तेरी कुड़माई हो गई?” और उत्तर में वही ‘धत्’ मिला। एक दिन जब फिर लड़के ने वैसे ही हँसी में चिढ़ाने के लिए पूछा तब लड़की, लड़के की संभावना के विरुद्ध बोली–”हाँ, हो गई।”

“कब?”
“कल–देखते नहीं यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू!”
सूबेदार के घर का संवाद
“मुझे पहचाना?”
“नहीं।”

“तेरी कुड़माई हो गई? ‘धत्’–कल हो गई–देखते नहीं रेशमी बूटोंवाला सालू–अमृतसर में–”सूबेदारनी कह रही है–”मैंने तेरे को आते ही पहचान लिया। ………तुम्हारे आगे मैं आँचल पसारती हूँ।”

  1. “ कल देखते नही ये रेशम से गढ़ा हुआ शालू ” । वह सुनते ही लहना की का प्रतिक्रिया हुई ?

उत्तर- ये बात सुनते ही लहना को काफी गुस्सा आया । साथ ही साथ वह अपने सुध बुध खो बैठा । इसलिए घर वापस आते समय एक लड़के को नाली में धकेल दिया , एक खोमचे वाले के खोमचे से बिखेर दिया , एक कुत्ते को पत्थर मारा और एक सब्जी वाले की दूध उड़ेल दिया एक पूजा पाठ करने वाली औरत से टकरा गया जिसने उसे अँधा कहा । ऐसे करते करते वो घर पंहुचा ।

  1. “ जाड़ा क्या है मौत है और निमोनिया से मरने वाले को मुरब्बे नही मिला करते ” वजीरा सिंह के इस कथन का क्या आशय है ?

उत्तर- वजीरा सिंह के इस कथन का आशय है की वहां युद्ध के मैदान में अत्यधिक ठंडा पड़ रही है जिसके कारण ऐसा लगता है कि मानो उसकी जान ही निकल जाएगी वैसे भी इस स्थिति में इतने लोगो को निमोनिया हो रहा है उन्हें मरने के लिए स्थान भी नही मिल रहा है ।

  1. ‘ कहती है तुम राजा हो मेरे मुल्क को बचाने आये हो वजीरा के इस कथन में किसकी ओर संकेत है ?

उत्तर – कहती है , तुम राजा हो , मेरे को बचाने आये हो ” वजीरा के इस कथन में फ्रांस की मेम ओर संकेत है ।

  1. लहना सिंह के गाँव में आया तुर्की मौलवी क्या कहता है ?

उत्तर- लहना के गाँव में आया तुर्की मौलवी कहता था की जर्मनी वाले बड़े पंडित है । वेद पढ़ पढ़कर वे विमान चलाने की विद्या जान गए है । मंडी में बनियों को बहकाता था कि डाकखाने से रुपया निकाल लो , सरकार का राज्य जाने वाला है ।

  1. लहना सिंह का दायित्व बोध और उसकी बुद्धि दोनों ही स्पृहणीय है । इस कथन की पुष्टि करे ।

उत्तर- ये सत्य है की ‘ लहना सिंह ‘ का दायित्व बोध और उसकी बुद्धि दोनों ही स्पृहणीय है । लहना सिंह ने जिस तरह अपना दायित्व निभाया , वो सच में काबिले तारीफ है क्योकि सुबेदारिनी ने अपना आँचल पसारकर अपने पति और बेटे की जान बचाने की भीख मांगी थी लहना से और बहादुर तथा वीर लहना ने अपनी जान का परवाह न करते हुए उन दोनों की जान बचाई थी । इतना ही नही लहना ने ‘ जमादार पद का दायित्व भी बड़ी बखूबी से निभाया था । लहना सिंह की बुद्धिमानी भी तारीफ़ करने योग्य है क्योकि नकली रूप में आये लपटन साहब ने सोचा कि मै लहना के फ़ौज में शामिल होकर लहना की फ़ौज को ही बम से उड़ा दू लेकिन लहना की चालाकी और बुद्धिमानी ने लपटन साहब को दबोच लिया । इस प्रकार से बहुत बुद्धिमानी से ये जंग जीता था ।

  1. प्रसंग एवं अभिप्राय बताएं‘ मृत्यु के कुछ समय पहले स्मृति बहुत साफ़ हो जाती है । जन्म भर की घटनाएँ एक – एक करके सामने आती है । सारे दृश्यों के रंग साफ़ होते है समय की धुंध बिलकुल उनपर से हट जाती है । 

उत्तर- प्रस्तुत पंक्ति चंद्रधर शर्मा गुलेरी द्वारा रचित पाठ उसने कहा था ‘ से लिया गया है । इस पंक्ति का आशय बड़ा ही भावुक है । जब लड़ाई खत्म हो जाती है तो लहना सिंह को अपने 12 वर्ष की अवस्था की याद आने लगती है । अमृतसर शहर के चौक पर दही वाले दुकान पर मिली वो 8 साल की लड़की , तेरी कुडमाई हो गई ? धत कहकर देने वाली जबाबे उनको बहुत याद आ रही थी । लहना सिंह जब जमादार पद पर नियुक्त हुआ था तब उस लड़की की याद उन्हें ज्यादा नही आ रही थी लेकिन जब मृत्यु नजदीक आने लगती है तो सारी बाते याद बनकर आने लगती है अर्थात सारे दृश्यों के रंग साफ़ होते है और समय की धुंध बिलकुल उनपर से हट जाती है ।

11.मर्म स्पस्ट करें

क ) अब के हाड़ में यह आम खूब फलेगा । चाचा भतीजा दोनों यही बैठकर आम खाना । जितना बड़ा भतीजा है उतना ही यह आम है । जिस महीने उसका जन्म हुआ था उसी महीने में मैंने इसे लगाया । 

उत्तर- प्रस्तुत पंक्ति चंद्रधर शर्मा गुलेरी द्वारा लिखित ‘ उसने कहा था से ली गई है।लहानासिंह बुरी तरह जख्मी है । उसका अंतिम समय निकट आ चुका प्रतीत हो रहा है।ऐसी अवस्था मे वो अतीत और भविष्य की स्मृतियो मे उलझा हुआ है । कभी उसे अतीत की घटनाएँ याद आती है तो कभी भविष्य की कल्पनाएँ उसे झकझोर जाती है।ऐसी ही एक कल्पना करते हुए वह वजीरासिंह से कहता है कि इस बार आषाढ के महीने मे यह आम खूब फलेगा । तुम और तुम्हारा भतीजा बैठकर खूब आम खाना । यह आम का पेड मैंने उसी महीने लगाया था जिस महीने तेरे भतीजे का जन्म हुआ था । यह आम का पेड तेरे भतीजे के बराबर है ।

ख ) और अब घर जाओ तो कह देना की मुझे जो उसने कहा था वह मैंने कर दिया । 

उत्तर- प्रस्तुत पंक्ति चंद्रधर शर्मा गुलेरी द्वारा रचित ‘ उसने कहा था ‘ से लिया गया है । सूबेदारनी ने लहनासिंह को एक दायित्व सौपा था कि उसके पति और बेटे के प्राणो की रक्षा करना । लहनासिंह ने उनदोनो की जान बचाकर उसे पूरा किया । उसने घायल होने के बावजूद उनदोनो को गाडियो मे भेज दिया और खुद वही रह गया । जब सूबेदार अपने बेटे के साथ जाने लगे तो लहनासिंह ने उनसे कहा कि जब घर जाओ तो सूबेदारनी से कह देना कि उसने मुझसे जो कहा था वह मैंने कर दिया ।

  1. ‘ उसने कहा था ‘ कहानी का केन्द्रीय भाव क्या है वर्णन करे ।

उत्तर- उसने कहा था ‘ कहानी में लेखक ने लहना सिंह के निश्छल प्रेम को दर्शाया है । लहना सिंह ने उस लड़की से बचपन में कई बार एक ही बात पूछा- तेरी कुडमाई हो गई क्या ? और लड़की धत कहकर दौड़ कर भाग जाती थी । इससे यह साफ प्रतीत होता है की लहना सिंह के दिल में उस लड़की के लिए प्रेम था और वो प्रेम निश्छल इसलिए था क्योकि लहना सिंह ने उस लड़की द्वारा दिए गए वचन को अपना वचन समझकर निभाया और अपना प्राण तक की आहुति दे दी ।

संपूर्ण क्रांति Subjective Questions

  1. भ्रष्टाचार की जड़ क्या हैक्या आप जेपी से सहमत हैंइसे दूर करने के लिए क्या सुझाव देंगे?

उत्तर  हमारी नजर में भ्रष्टाचार की जड़ सरकार की गलत नीतियाँ हैं। इन गलत नीतियों के कारण भूख है, महँगाई है, भ्रष्टाचार है कोई काम जनता का नहीं निकलता है बगैर रिश्वत दिए। सरकारी दफ्तरों में बैंकों में, हर जगह, टिकट लेना है उसमें जहाँ भी हो, रिश्वत के बगैर काम नहीं होता। हर प्रकार के अन्याय के नीचे जनता दब रही है। शिक्षण–संस्थाएँ भ्रष्ट हो रही है। हमारे नौजवानों का भविष्य अंधेरे में पड़ा हुआ है। जीवन उनका नष्ट हो रहा है इस प्रकार चारों ओर भ्रष्टाचार व्याप्त है। इसे दूर करने के लिए समाजवादी तरीके से सरकार ऐसी नीतियाँ बनाएँ जो लोककल्याणकारी हो।

  1. दलविहीन लोकतंत्र और साम्यवाद में कैसा संबंध है?

उत्तर  दलविहीन लोकतंत्र सर्वोदय विचार का मुख्य राजनीतिक सिद्धान्त है और ग्राम सभाओं के आधार पर दलविहीन प्रतिनिधित्व स्थापित हो। दलविहीन लोकतंत्र तो मार्क्सवाद तथा लेनिनवाद के मूल उद्देश्यों में से है। मार्क्सवाद के अनुसार समाज जैसे–जैसे साम्यवाद की ओर बढ़ता जाएगा, वैसे–वैसे राज्य–स्टेट का क्षय होता जाएगा और अंत में एक स्टेटलेस सोसाइटी कायम होगी। वह समाज अवश्य ही लोकतांत्रिक होगी, बल्कि उसी समाज में लोकतंत्र का सच्चा स्वरूप प्रकट होगा और वह लोकतंत्र निश्चय ही दलविहीन होगा।

  1. संघर्ष समितियों से जयप्रकाश नारायण की क्या अपेक्षाएँ हैं?

उत्तर  संघर्ष समितियों से जयप्रकाश नारायण की निम्नलिखित अपेक्षाएँ हैं

  • सभी संघर्ष समितियाँ मिलकर चुनावों में अपना उम्मीदवार खड़ा करें अथवा जो उम्मीदवार खड़े किए जाएँ उनमें से किसी को मान्य करें।
  • चुनावों में इन समितियों द्वारा खड़ा किया गया जो भी उम्मीदवार जीते, उसके भावी कार्यक्रमों पर नजर रखने का काम ये समितियाँ करेंगी।
  • यदि कोई प्रतिनिधि गलत रास्ता चुनता है तो ये समितियाँ उसको इस्तीफा देने के लिए बाध्य करेंगी।
  • इन संघर्ष समितियों का काम केवल शासन से संघर्ष करना ही नहीं है बल्कि समाज के हर अन्याय और अनीति के विरुद्ध संघर्ष करना होगा।
  • इन समितियों का कार्य सभी अफसरों तथा कर्मचारियों में विद्यमान घूसखोरी के विरुद्ध संघर्ष करना भी होगा।
  • जिन बड़े–बड़े किसानों ने बेनामी या फर्जी बन्दोबस्तियों की हैं उनका विरोध भी ये समितियाँ करेंगी।
  • गाँवों में तरह–तरह के अन्याय होते हैं, वे समितियाँ उन अन्यायों को भी रोकेंगी।
  1. आन्दोलन के नेतृत्व के संबंध में जयप्रकाश नारायण के क्या विचार थेआन्दोलन का नेतृत्व किस शर्त पर करते हैं?

उत्तर  आन्दोलन के नेतृत्व के संबंध में जयप्रकाश नारायण कहते हैं कि मैं सबकी सलाह लूँगा, सबकी बात सुनूँगा। छात्रों की बात जितना भी ज्यादा होगा, जितना भी समय मेरे पास होगा, उनसे बहस करूंगा समझूगा और अधिक से अधिक बात करूँगा। आपकी बात स्वीकार करूँगा, जनसंघर्ष समितियों की लेकिन फैसला मेरा होगा। इस फैसले को सभी को माना होगा। जयप्रकाश आन्दोलन का नेतृत्व अपने फैसले पर करते हैं और कहते हैं कि तब तो इस नेतृत्व का कोई मतलब है, तब यह क्रान्ति सफल हो सकती है। और नहीं, तो आपस की बहसों में पता नहीं हम किधर बिखर जाएंगे और क्या नतीजा निकलेगा?

  1. जयप्रकाश नारायण के छात्र जीवन और अमेरिका प्रवास का परिचय दें। इस अवधि की कौन–कौन सी बातें आपको प्रभावित करती हैं?

उत्तर  जयप्रकाश नारायण का प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुआ था। 1921 ई. की जनवरी महीने में पटना कॉलेज में वे आई–एस. सी. के छात्र थे। उसी समय वे गाँधीजी के असहयोग आन्दोलन के आह्वान पर असहयोग किया और असहयोग के करीब डेढ़ वर्ष ही मेरा जीवन बीता था कि मैं फूलदेव सहाय वर्मा के पास भेज दिया गया कि प्रयोगशाला में कुछ करो और सीखो। मैंने हिन्दू विश्वविद्यालय में दाखिला इसलिए नहीं लिया क्योंकि विश्वविद्यालय को सरकारी मदद 19 सम्म मिलती थी। बिहार विद्यापीठ से परीक्षा पास की। बचपन में स्वामी सत्यदेव के भाषण से प्रभावित होकर अमेरिका गया। ऐसे में कोई धनी घर का नहीं था परन्तु मैंने सुना था कि कोई भी अमेरिका में मजदूरी करके पढ़ सकता है।

मेरी इच्छा थी कि आगे पढ़ना है मुझे। अमेरिका के बागानों में मैंने काम किया, कारखानों में काम किया, लोहे के कारखानों में। जहाँ जानवर मारे जाते हैं उन कारखानों में काम किया। जब वे युनिवर्सिटी में पढ़ते ही तब वे छुट्टियों में काम कर इतना कमा लेते थे कि दो–चार विद्यार्थी सस्ते में खा–पी लेते थे। एक कोठरी में कई आदमी मिलकर रहते थे। रविवार की छुट्टी नहीं बल्कि एक घंटा रेस्तरां में होटल में बर्तन धोया या वेटर का काम किया। बराबर दो तीन वर्षों तक दो–तीन लड़के एक ही रजाई में सोकर पढ़े थे। जब बी. ए. पास कर गये तो स्कॉलरशिप मिल गई, तीन महीने के बाद असिस्टेंट हो गये डिपार्टमेंट के ट्यूटोरियल क्लास लेने लगे। अमेरिका प्रवास में जयप्रकाश नारायण के कैलिफोर्निया बर्कले, विलिकंसन मेडिसन आदि कई विश्वविद्यालयों में अध्ययन किया। इस तरह अमरिका में इनका प्रवास रहा।

  1. जयप्रकाश नारायण कम्युनिस्ट पार्टी में क्यों नहीं शामिल हुए?

उत्तर  जयप्रकाश ने लेनिन से सीखा था कि जो गुलाम देश है, वहाँ के जो कम्युनिस्ट हैं उनको हरगिज वहाँ की आजादी की लड़ाई से अपने को अलग नहीं रखना चाहिए। क्योंकि लड़ाई का नेतृत्व ‘बुजुओ वर्ग’ के हाथ में होता है, पूँजीपतियों के हाथ में होता है। अतः कम्युनिस्टों को अलग नहीं रहना चाहिए। अपने को आइसोलेट नहीं रहना चाहिए। जयप्रकाश देश की आजादी के खातिर कांग्रेस में शामिल हुए क्योंकि कांग्रेस देश का नेतृत्व कर नही थी।

  1. पाठ के आधार पर प्रसंग स्पष्ट करें
    (
    क) अगर कोई डिमॉक्रेसी का दुश्मन हैतो वे लोग दुश्मन हैं जो जनता के शान्तिमय कार्यक्रमों में बाधा डालते हैं उनकी गिरफ्तारियाँ करते हैंउन पर लाठी चलाते हैंगोलियाँ चलाते हैं।
    (
    ख) व्यक्ति से नहीं हमें तो नीतियों से झगड़ा हैसिद्धान्तों से झगड़ा हैकार्यों से झगड़ा है।

उत्तर–

व्याख्या–
(क) प्रस्तुत पंक्तियाँ महान समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण की ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ शीर्षक भाषण से ली गई है। इन पंक्तियों में जयप्रकाश नारायण ने लोकतंत्र के दुश्मनों का वर्णन किया है। जयप्रकाश तत्कालीन सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए यह बातें कहते हैं। प्रसंग यह है कि एक पुलिस के उच्चाधिकारी ने कहा कि नाम लेना यहाँ ठीक नहीं होगा कि मैंने दीक्षितजी के मुँह से सुना है कि ‘जयप्रकाश नारायण’ नहीं होते तो बिहार जल गया होता। तब जयप्रकाश नारायण यह सोचते हैं कि यह सारा जयप्रकाश के लिए क्यों होता है? उनके नेतृत्व में यह प्रदर्शन और यह सभा होनेवाली है, क्यों लोगों को रोकते हैं आप? जनता से घबराते हैं आप? जनता के आप प्रतिनिधि हैं? किसकी तरफ से शासन करने बैठे हैं आप? आपकी हिम्मत की पटना आने से लोगों को रोक लें आप? यहाँ लोकतंत्र है और लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति को शान्तिपूर्ण सभा करने का अधिकार है। यदि सरकार यह सब करने से रोकती है तो वह सरकार के निकम्मेपन और नीचता का प्रतीक है।

(ख) प्रस्तुत वाक्य जयप्रकाश, नारायण के भाषण ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ से लिया गया है। आन्दोलन के समय जयप्रकाश नारायण के कुछ ऐसे मित्र थे जो चाहते थे कि जेपी और इन्दिरा म जी में मेल–मिलाप हो जाए। इसी प्रसंग में जेपी ने कहा है कि उनका किसी व्यक्ति से झगड़ा नहीं है। चाहे वह इन्दिराजी हो या या कोई और उन्हें तो नीतियों से झगड़ा है, सिद्धान्तों से झगड़ा है, कार्यों से झगड़ा है। जो कार्य गलत होंगे जो नीति गलत होगी, जो सिद्धान्त गलत होंगे–चाहे वह कोई भी करे–वे विरोध करेंगे।

  1. बापू और नेहरू की किस विशेषता का उल्लेख जेपी ने अपने भाषण में किया है?

उत्तर  जेपी ने अपने भाषण में बापू एवं नेहरूजी की विशेषताओं का उल्लेख किया है। जयप्रकाश कहते हैं कि जब हम नौजवान थे तब उस जमाने में यह जुर्रत होती थी हमलोगों की बापू के सामने हम कहते थे हम नहीं मानते हैं बापू यह बात। और बापू में इतनी महानता थी कि वे बुरा नहीं मानते थे। फिर भी बुलाकर हमें प्रेम से समझाना चाहते थे समझते थे। जेपी कहते हैं कि जवाहरलाल मुझे मानते बहुत थे। मैं उनका बड़ा आदर और प्रेम करता था परन्तु उनकी कटु आलोचना भी करता था। लेकिन बड़प्पन था कि वे बुरा नही मानते थे। अक्सर वे हमारी आलोचनाओं का बुरा नहीं माना। उनके साथ जो मतभेद था वह परराष्ट्र की नीतियों को लेकर था।

  1. जयप्रकाश नारायण के इस भाषण से आप अपना सबसे प्रिय अंश चुनें और बताएं कि वह सबसे अधिक प्रभावी क्यों लगा?

उत्तर  इस भाषण में हमारा सबसे प्रिय अंश निम्नलिखित हैं–”मित्रो, अमेरिका के बागानों में मैंने काम किया कारखानों में काम किया–लोहे के कारखानों में। जहाँ जानवर मारे जाते हैं, उन कारखाने में काम किया। जब यूनिवर्सिटी में पढ़ता था, छुट्टियों में काम करके इतना कमा लेता था कि कुछ खाना हम तीन–चार विद्यार्थी मिलकर पकाते थे और सस्ते में हम लोग खा–पी लेते थे। एक कोठरी में कई आदमी मिलकर रह लेते थे रुपया बचा लेते थे, कुछ कपड़े खरीदने, कुछ फीस के लिए। और बाकी हर दिन–रविवार को भी छुट्टी नहीं…. एक घंटा रेस्तरां में, होटल में या तो बर्तन धोया या वेटर का काम किया तो शाम को रात का खाना मिल गया, दिन का खाना मिल गया। किराया कहाँ से मकान का हमको आया?

बराबर दो–तीन लड़के कितने वर्षों तक दो चारपाई नहीं थी कमरे में एक चारपाई पर मैं और कोई न कोई अमेरिकन लड़का रहता था। हम दोनों साथ सोते ते, एक रजाई हमारी होती थी। इस गरीबी में मैं पढ़ा हूँ। इतवार के दिन या कुछ ‘ऑड टाइम’ में यह जो होटल का काम है–उसको छोड़ करके जूते साफ करने का काम ‘शू शाइन पार्लर’ में उससे ले करके कमोड साफ करने का काम होटलों में करता था। वहाँ जब बी.ए. पास कर लिया, स्कॉलरशिप मिल गई; तीन महीने के बाद असिस्टेंट हो गया डिपार्टमेंट का ‘ट्यूटोरियल क्लास’ लेने लगा, तो कुछ आराम से रहा इस बीच में। इन लोगों से पूछिए। मेरा इतिहास ये जानते हैं और जानकर भी मुझे गालियाँ देते हैं।”

यह अंश हमें सबसे अधिक प्रभावी इसलिए लगा क्योंकि इसमें एक विद्यार्थी के कठोर परिश्रम और शिक्षा प्राप्ति के प्रति सच्ची लगन का चित्रण है। जयप्रकाश नारायण जी ने विदेश में रहकर किन कठिनाइयों के बीच अपनी पढ़ाई की इसकी यहाँ मार्मिक अभिव्यक्ति है।

  1. चुनाव सुधार के बारे में जयप्रकाश जी के प्रमुख सुझाव क्या हैंउन सुझावों से आप कितना सहमत हैं?

उत्तर  चुनाव सुधार के बारे में जयप्रकाश जी के प्रमुख सुझाव निम्नलिखित हैं–

  • चुनाव को पद्धति में आमूल परिवर्तन होना चाहिए।
  • चुनावों पर होनेवाला खर्च कम करना चाहिए।
  • गरीब उम्मीदवारों के चुनाव में भाग लेने का प्रयास करना चाहिए।
  • मतदान प्रक्रिया स्वच्छ और स्वतन्त्र हो।
  • उम्मीदवारों के चयन में मतदाताओं का हाथ वास्तव में हो।
  • चुनाव के बाद मतदाताओं का अपने प्रतिनिधियों पर अंकुश हो।
  • जन–संघर्ष समितियाँ आम राय से जनता के लिए सही उम्मीदवार का चयन करे।
  1. दिनकरजी का निधन कहाँ और किन परिस्थितियों में हुआ?

उत्तर  निधन के दिन दिनकर जी जेपी से मिले थे। उसी रात्रि में वे जेपी के मित्र रामनाथजी गोयनका (इंडियन एक्सप्रेस के मालिक) के घर पर मेहमान थे। रात को दिल का दौरा पड़ा। तीन मिनट में उनको अस्पताल पहुंचाता गया। सारी व्यवस्था थी वहाँ पर। सभी डॉ. सब तरह से तैयार थे। दिनकरजी फिर से जिंदा नहीं हो पाए। उसी रात उनका निधन हो गया।

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